दिल्ली की प्यास: बजट के कागजी तारे और जमीन के गंदे नल

दिल्ली। यह नाम आते ही दिमाग में एक चकाचौंध, तेज रफ्तार जिंदगी और राष्ट्रीय शक्ति का केंद्र बिम्ब उभरता है। लेकिन इसी दिल्ली के एक कोने में, नंगली विहार के ब्लॉक सी-5 में, एक और तस्वीर बनती है – बाल्टी भर-भर कर पानी खरीदते परिवार, बदबूदार नल, और बच्चों के पेट में उतरती वह काला-पीली लिक्विड जिसे ‘पीने का पानी’ कहा जाता है।

यह कोई नई खबर नहीं है। यह एक दशक पुरानी सिसकी है जो नलों से रिस-रिस कर आती है। हैरानी की बात यह है कि जब दिल्ली की नई सरकार ने 2025-26 का अपना पहला ‘ऐतिहासिक’ बजट पेश किया, जिसमें पानी पर 9,000 करोड़ रुपये खर्च करने का ऐलान था, तब भी नंगली विहार के लोगों ने उसी दिन चीख भरी – “हमारा पानी अब भी सीवर जैसा बदबूदार है।”

बजट: वादों का विशाल महल

बजट भाषण एक सिनेमाई स्क्रिप्ट की तरह है। एक ‘महाकाव्य शुरुआत’ है – “यह कोई सामान्य बजट नहीं है।” एक ‘खलनायक’ है – पिछली सरकार जिसने यमुना को “गंदगी की नाली” बना दिया, अस्पताल बंद किए, और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं को अपने नाम के अहंकार में लागू नहीं होने दिया। और एक ‘नायक’ है – नई सरकार जो “डबल इंजन” की ताकत से दिल्ली को बुलेट ट्रेन की स्पीड से आगे ले जाएगी।

आंकड़े चकाचौंध कर देने वाले हैं:

· कुल बजट: 1 लाख करोड़ रुपये (पिछले साल से 31.5% अधिक)
· पानी-सीवर-यमुना पर: 9,000 करोड़ रुपये
· योजनाएं: यमुना में 40 नए डी-सेंट्रलाइज्ड सीवेज प्लांट, पुरानी पाइपलाइन बदलना, टैंकरों पर जीपीएस, ‘डीजेबी टैंकर’ ऐप।

यह भाषण आत्मविश्वास से भरा है। इसमें चाणक्य, विनोबा भावे और बशीर बद्र के उद्धरण हैं। यह दिल्ली को “विश्व के पर्यटन केंद्र” और “राष्ट्रीय प्रगति की पहचान” बनाने का सपना दिखाता है। कागज पर, सब कुछ परफेक्ट है।

हकीकत: नल से टपकती त्रासदी

अब उसी दिन की एक दूसरी कहानी देखिए। 5 मई, 2025 को नंगली विहार के लोगों ने दिल्ली जल बोर्ड के अध्यक्ष को एक पत्र लिखा। यह कोई साधारण शिकायत नहीं, बल्कि एक सामूहिक विलाप है:

“पानी साफ तौर पर गंदा (पीले और काले रंग का) है, सीवेज जैसी दुर्गंध फैलाता है और इसमें गंदा झाग होता है… लगातार 10 महीने से यही हाल है… स्थानीय अधिकारियों से कई शिकायतें की गईं लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।”

पत्र पर 20 से ज्यादा लोगों के हस्ताक्षर हैं – शिव राम कुशवाहा, रानी लाल, बीना देवी, रण बहादुर यादव… हर नाम के आगे एक मोबाइल नंबर और एक मकान नंबर है। यह अमूर्त ‘जनता’ नहीं, बल्कि सच्चे, सांस लेते लोगों का दस्तखत है जो हर रोज जहर पी रहे हैं।

सबूत: फाइलों में दबा सच

सबसे डरावना सच दिल्ली जल बोर्ड की अपनी फाइलों में छुपा है। दैनिक जल गुणवत्ता निगरानी रिपोर्ट नाम की इन फाइलों में हर दिन शहर भर से लिए गए पानी के नमूनों का ब्योरा होता है।

· 15 मई, 2024: नंगलोई लैब ने 189 नमूने लिए। 6 ‘असंतोषजनक’ मिले। उनमें से एक का पता था: “H. no. 626, G. No. 08, Nangli Vihar Extn”। और ‘क्लैरिटी’ कॉलम में लिखा था – “सीवेज”।
  यानी आज से एक साल पहले ही, सिस्टम को पता था कि नंगली विहार एक्सटेंशन के घर नंबर 626 में सीवेज मिला पानी आ रहा है।
· फरवरी 2025 (बजट पेश होने के कुछ ही महीने पहले): रिपोर्ट दिखाती है कि नंगलोई इलाके में अभी भी ‘सीवेज’ क्लैरिटी वाले पानी के नमूने मिल रहे हैं।

मतलब साफ है: यह समस्या नई नहीं है, छिपी हुई नहीं है। यह ऑफिशियल रिकॉर्ड में दर्ज है। फिर भी, 10 महीने तक कोई हल नहीं निकला।

शिकायत का सफर: मुख्यमंत्री से सीईओ तक का चक्कर

25 मई, 2025 को एक युवा शिवम कुशवाहा ने इस शिकायत को ईमेल से भेजा। उन्होंने इसे सीधे दिल्ली जल बोर्ड, मुख्यमंत्री और स्थानीय सांसद को भेजा।

· पहला पड़ाव: मुख्यमंत्री का ऑफिस। उनके सचिव ने ईमेल पढ़ा और आगे भेज दिया – जल मंत्री के ऑफिस को।
· दूसरा पड़ाव: जल मंत्री के ऑफिस ने इसे ‘उचित कार्रवाई’ के लिए आगे भेज दिया – दिल्ली जल बोर्ड के सीईओ को।
· तीसरा पड़ाव: डीजेबी सीईओ के ऑफिस से इसे ‘संबंधित अधिकारी’ को भेज दिया गया।

और यहीं… शिकायत की आवाज ‘फाइल’ में दफन होने लगती है। यह वही ‘लालफीताशाही’ है जिसकी बजट भाषण में आलोचना की गई थी। अंततः, जिम्मेदारी किसकी है? स्थानीय इंचार्ज की? जोनल इंजीनियर की? या फिर वो सिस्टम जिसमें एक शिकायत इतने ऑफिसों का चक्कर लगाती है कि थक कर मर जाती है?

विडंबना का शिखर: दो दिल्ली का अंतर

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे गहरी विडंबना यह है:

1. एक तरफ: बजट भाषण में पिछली सरकार पर आरोप कि उसने “यमुना को गंदगी की नाली बना दिया”।
2. दूसरी तरफ: दिल्ली जल बोर्ड की अपनी रिपोर्ट कहती है कि नागरिकों के नलों से ‘गंदगी की नाली’ (सीवेज) का पानी आ रहा है।

सवाल यह है: क्या यमुना साफ करने का सपना देखने से पहले, उस सीवर लाइन को ठीक करना ज्यादा जरूरी नहीं जो सीधे नंगली विहार के घरों में गंदगी घोल रही है?

मानवीय पीड़ा: सिर्फ पानी नहीं, जिंदगी का संकट

इस संकट को सिर्फ ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर फेलियर’ कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। इसके पीछे मानवीय पीड़ा है:

· आर्थिक बोझ: गरीब परिवार जो रोजाना 50-100 रुपये पीने का पानी खरीदने पर मजबूर हैं। एक महीने में यह 1500-3000 रुपये का अतिरिक्त खर्च है।
· स्वास्थ्य का जोखिम: हैजा, टायफाइड, हेपेटाइटिस, दस्त – ये सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि इन इलाकों में रोज की आशंका हैं। बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा असुरक्षित।
· गरिमा का हनन: अपने ही घर में, अपने ही नल से, साफ पानी की एक बूंद के लिए तरसना – यह नागरिक होने के बुनियादी अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
· विश्वास का टूटना: जब एक शिकायत 10 महीने तक दर-दर भटकती है, तो लोगों का सिस्टम से विश्वास उठ जाता है। वोट बैंक की राजनीति में फंसकर योजनाओं का लाभ ‘गैर-योग्य’ लोगों तक पहुंचने की बजट में चिंता जताई गई है, लेकिन ‘योग्य’ लोगों तक साफ पानी जैसी बुनियादी चीज पहुंचाने की चिंता कहीं दिखाई नहीं देती।

टेस्टिंग के दौरान शिव राम कुशवाहा जी द्वारा ली गई वीडियो

निष्कर्ष: बजट से आगे की राह

दिल्ली का जल संकट सिर्फ पैसे का नहीं, नीयत और निगरानी का संकट है। आवश्यकता इस बात की है कि:

1. तत्काल राहत: बजट में ‘एमजीडी’ और ‘करोड़ रुपये’ के आंकड़े गिनाने से पहले, नंगली विहार जैसे हॉटस्पॉट्स पर इमरजेंसी टीम भेजकर पानी की आपूर्ति का स्रोत ठीक किया जाए।
2. पारदर्शी निगरानी: दैनिक जल गुणवत्ता रिपोर्ट को सार्वजनिक डैशबोर्ड पर रियल-टाइम प्रकाशित किया जाए, ताकि हर नागरिक जान सके कि उसके इलाके का पानी कैसा है।
3. सीधी जवाबदेही: हर जोन के जल बोर्ड अधिकारी की परफॉर्मेंस उस क्षेत्र में मिलने वाली शिकायतों के निवारण और पानी की गुणवत्ता से जोड़ी जाए।
4. नागरिक को केंद्र में रखना: ‘स्मार्ट ऐप’ और ‘हाइ-टेक सिस्टम’ बनाने से पहले, शिकायत दर्ज कराने वाले नागरिक को एक यूनिक शिकायत संख्या दी जाए और उसे एसएमएस के जरिए हर स्टेटस अपडेट मिले।

दिल्ली तभी ‘विकसित’ या ‘स्मार्ट’ बनेगी, जब उसकी सबसे गरीब कॉलोनी के सबसे पिछड़े घर का नल, बजट भाषण की चमकदार भाषा की तरह साफ और स्वच्छ पानी से भरा होगा। वरना, यह बजट ‘वादों का महल’ बनकर रह जाएगा, जिसकी नींव में नंगली विहार के लोगों के आंसू और उनका दूषित पानी ही मिलेगा।

जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक दिल्ली के दो चेहरे बने रहेंगे – एक, विधानसभा में चमकते स्टेज और लाखों करोड़ के आंकड़े गिनाते नेता; और दूसरा, एक कतार में खड़ा आम आदमी, जिसके हाथ में बाल्टी है और नल से टपक रहा है उम्मीदों का काला पानी।

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